क्रिकेट का शौकीन बचपन से रहा हूँ। तब भी जब टेलीविज़न नहीं हुआ करता था, रेडियो पर कमेंट्री सुनते थे। एक वाकया याद आ रहा है, मालूम नहीं किस मैच का है, फिर भी बताता हूँ। क्रिकेट मैच हो रहे थे, सर्दियों का समय था। आधी रात से कमेंट्री आती थी। अचानक माँ ने हमको जगाया कि पिताजी घर पर नहीं हैं।
पिताजी तो गायब हुए ही साथ में जिस रजाई को ओढ़ के सोये थे वो भी गायब। सब घर में परेशान, करीब छह बजे पिताजी रजाई और रेडियो लेकर घर वापिस आ गए। मालूम पड़ा अपने दोस्त जो कि अकेले रहते थे उनके पास रेडियो लेकर कमेंट्री सुनने रजाई समेत पहुँच गए।
फिर श्याम-श्वेत टेलीविजन का जमाना आया, घर में टेलीविजन नहीं था। मैच देखने तीन किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। वो भी उनके घर पर जहाँ नीचे चटाई में बैठ के मैच देखने को मिलता था। बाकी टेलीविजन मालिक के परिवार वाले शान से चारपाई पर बैठकर मैच देखते थे। हम अछूत के जैसे चप्पल बाहर उतार कर नीचे जमीन में बैठकर ही खुश हो लेते थे। जिस दोस्त के घर में मैच देखने जाते थे उसको बड़ी इज्जत की नजर से देखा जाता था।
लेकिन दोस्तों आज LED, LCD, 40 इंच, 50 इंच के टेलीविजन पर भी वो मजा नहीं आता जो तब नीचे, हिकारत भरी नजरों से मैच देखने में आता था।
सात-सात किलोमीटर दूर भी पहाड़ों में ऐसे मैच देखने गया हूँ। 14 किलोमीटर की ट्रैकिंग तो तब ऐसे ही मजाक-मजाक में हो जाती थी।
