रविवार का बोरियत भरा दिन होना था। इसलिए पहले ही तय कर लिया था कि इस बार रविवार को दिल्ली हाट (INA) में चल रहे भारतीय महिला उत्सव को देखने जाऊंगा। इसका एक मुख्य कारण यह भी था कि उत्तराखण्ड की किसान बिटिया "रंजना रावत" के स्टाल को देखना था।
Sunday, 16 October 2016
Friday, 7 October 2016
अँधेरे में ट्रैकिंग
अभी हाल में ही कैलाश कुण्ड ट्रैक करके आया हूँ। एक तरह से शानदार यात्रा रही। ऐसे नए अनुभव तो हर यात्रा में होते हैं तो ये यात्रा भी इसका अपवाद नहीं रही।
अभी कुछ दिन पहले मैंने एक राय रखी थी एक व्हाट्स एप्प ग्रुप में। रखी क्या थी जबरदस्ती रखवा दी गई। मेरा मानना है कि पहाड़ों पे अगर आप ग्रुप में यात्रा कर रहे हैं तो दिन में जैसा मर्जी चलें, एक दो किलोमीटर का फासला भी आपस में साथियों के बीच हो तो कोई दिक्कत नहीं। लेकिन अँधेरा छाते ही पूरे ग्रुप को कोशिश करनी चाहिए कि एक साथ चलें। वैसे तो किसी भी ट्रैक की प्लानिंग ऐसी होनी चाहिए कि पहाड़ों में अँधेरे में चलना ही ना पड़े।
लेकिन ट्रैक पर कई ऐसी बातें हो जाती हैं जो हमारे वश में नहीं होती। अगर ऐसी कोई परिस्तिथि आ जाए तो बजाय आगे-आगे भागने के कोशिश करनी चाहिए कि पूरा ग्रुप एक साथ चले।
मेरे मित्रों ने इस विषय पर तर्क दिए कि आगे चलकर किसी को कैम्पिंग के लिए जगह ढूंढनी चाहिए। लेकिन मेरा मानना है कि अगर अँधेरे में पीछे छूटे साथी के साथ खुदा ना खास्ता कोई दुर्घटना हो जायेगी तो अँधेरे में किस किस खाई में ढूंढते रहोगे। साथ चलोगे तो जो भी होगा साथ झेलेंगे।
कई मित्रों ने कई आर्गुमेंट किये...लेकिन दोस्तों बचपन से बड़े बुजुर्गों से हमेशा ही सुनता आया हूँ "गैर वक़्त", जी हाँ जैसे ही अँधेरा छाने लगता है उस वक़्त को गैर वक़्त कहते हैं। यानी ये समय गैरों का है। अक्सर चोट लगने की, गिर कर फिसलने की घटनाएं इसी वक़्त पर होती हैं।
हो सकता है आज की गूगल जिन्दगी में मेरी बातें तर्कसंगत ना हों। लेकिन पहाड़ों में यही सिखाया जाता है बचपन से, और मैं तो इसी को मानूँगा। मैंने कई दुर्घटनाओं को इसी गैर वक्त में होते देखा है। बाकी सभी समझदार हैं। आपके विवेक पर छोड़ता हूँ..
Sunday, 2 October 2016
देवभूमि में आपका स्वागत है
देवभूमि में आपका स्वागत है
जब भी आप उत्तराखण्ड या हिमाचल में किसी भी क्षेत्र से प्रवेश करते हैं, तो एक बड़ा सा बोर्ड सड़क के बीचों-बीच अक्सर दिखेगा "देवभूमि में आपका स्वागत है"। क्या है देवभूमि ? क्या जगह-जगह खूबसूरत जगहों पर मन्दिरों का होना ही देवभूमि है ? क्या ऊंची-ऊंची चोटियों पर देवस्थान होना ही देवभूमि है ? ये विषय विचारणीय है।
Saturday, 1 October 2016
आदमखोर बाघ के क्षेत्र में ट्रैकिंग
एक बचपन की याद शेयर कर रहा हूँ आप सभी के साथ... शायद सन 1993-94 की बात है। मैं ग्रेजुएशन कर रहा था, पहाड़ों में हल्की सर्दियाँ शुरू हो चुकी थी। पहाड़ों में सर्दियाँ शुरू होने का मतलब होता है दिन जल्दी ढलना, मैं और मेरा दोस्त कम चाचा श्रीनगर से कल्जीखाल पहुँचे पिताजी से मिलने, जहाँ पिताजी प्राध्यापक के रूप में कार्यरत थे।
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