पर्यटन, पर्यटन स्थलों पर भीड़, मीडिया और सरकारी तंत्र
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दोस्तों आजकल मीडिया से लेकर राजनेता और जिसे भी देखो पर्यटन स्थलों की भीड़ पर ज्ञान दिए जा रहे हैं। चूंकि मैं स्वयं पर्यटन व्यवसाय से जुड़ा हूँ, और जबसे यह कोरोना महामारी आई है तबसे पहाड़ों पर रहा हूँ, इसलिए इस सेक्टर की मूलभूत परिस्थितियों से अच्छे से वाकिफ हूँ।
मैं इन सब बातों से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ, क्योंकि बिना सोचे व बिना जाने घर के अंदर से बैठकर ज्ञान देने वाले क्या ही समझेंगे इसकी कल्पना कर सकता हूँ।
पर्यटन एक बहुत ही विस्तृत क्षेत्र है, लेकिन मैं एक छोटे से उदाहरण के साथ अपने पॉइंट को समझाने का प्रयास करूंगा। अक्सर आप लोग ऋषिकेश से आगे पहाड़ों पर गए होंगे, सबसे पहले व्यासी में कुछ भोजनालय हैं, फिर तीन धारा व आगे देवप्रयाग, जहां अक्सर यात्री य्या पर्यटक भोजन करते हैं। सिर्फ पर्यटकों व यात्रियों से इस क्षेत्र के कितने गांवों के घरों की रोजी रोटियां चलती हैं जरा इसका आकलन कीजिये। बाकी आगे बद्रीनाथ या केदारनाथ तक का सोचिए। और असल स्थिति जाननी है तो उनकी आज की हालत भी देख लीजिए। दो साल हो गए हैं, कोई। एक दो महीना नहीं जो कि गुजारा जैसे तैसे कर लें। आपको दो महीने तनख्वाह न मिले और दो साल तक न मिले तो स्वयं की स्थिति क्या होगी जरा एक बार सोचिएगा।
एक पर्यटक घर से बाहर निकलता है तो उससे कितनों का घर चलता है और जहां जहां से वो गुजरता है वहां की अर्थव्यवस्था कैसे दौड़ती है इसको समझिए। पर्यटक पहाड़ों पर जाएगा तो गरम कपड़े भी खरीदेगा, कपड़ा व्यवसाय को फर्क पड़ेगा। गाड़ी में पेट्रोल, डीजल भी डालेगा, सरकार को सीधा आर्थिक लाभ। सड़क से जहां से भी गुजरेगा उसके किनारे स्थित ढाबों, होटल को लाभ। सड़क पर टोल टैक्स भरेगा, जहां रुकेगा वहां होटल मालिक से लेकर सभी कर्मचारियों का जीवन यापन। हिल स्टेशन पर घूमेगा तो रेडी वालों, घोड़े वाले व जो अन्य लोग सीधे पर्यटन व्यवसाय से जुड़े हैं उनकी आर्थिकी सभी कुछ पर असर पड़ता है।
ये भी सर्व विदित है कि महामारी के इस दौर में सबसे अधिक कुछ प्रभावित हुआ है तो पर्यटन ही प्रभावित हुआ है। पर्यटन का नाम सुनते ही हमारे जेहन में सिर्फ होटल और उनके मालिक को होने वाले लाभ ही मन मे आता है, लेकिन हम भूल जाते हैं बाकी अन्य को, जो और इससे प्रभावित होते हैं उनके लिए शायद ही किसी ने सोचा हो।
क्या पिछले दो वर्ष में किसी भी सरकार ने या व्यक्ति ने पर्यटन क्षेत्र के लिए कुछ सोचा है ? रत्ती भर भी नहीं, और बाकी सबके लिए सोचा तो क्या कोरोना को रोक पाए ? एक इंसान से शुरू हुआ ये वायरस आज पूरे विश्व में फैला पड़ा है। अगर कुछ बन्द करने से रुकना होता तो शुरू में ही रुक चुका होता। फिर ऐसे में आवश्यक क्या है ? क्या फिर से पर्यटन बन्द कर दें ? क्योंकि आज तक के ट्रेंड से तो सबसे पहले पर्यटन को ही बंद किया गया है। बन्द करना समाधान कतई नहीं है, अब आवश्यक है कि पर्यटकों को नए तरीके से व वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार जिम्मेदारी के साथ घर से बाहर निकल कर घूमने जाना होगा। अब वो सब हरकतें हमको बन्द करनी होंगी जो घूमते हुए पहले किया करते थे। कुछ भी खा कर कहीं भी फेंक देना, पानी की बोतलें सड़क किनारे फेंक देना ये सब बन्द कर जिम्मेदारी निभाकर घूमने निकलें तो उसमें किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए।
रही बात पर्यटक स्थलों पर क्राउड कंट्रोल तो ये सरकार व प्रशाशन को देखना होगा। अमरनाथ यात्रा में प्रशासन क्राउड कंट्रोल मैनेजमेंट का सहारा आज तक लेती आई है, उससे सीखकर ये सब किया जा सकता है। आप इस बारे में कुछ न सोचकर सीधा सीधा पर्यटकों पर चिल्लम पों करें और तीसरी लहर का रोना रोते रहें तो यकीन मानिए जो बची खुची कमर पर्यटन क्षेत्र की बची है उसको टूटने में एक महीना नहीं लगेगा।
बाकी राजनीतिक रैलियों की भीड़ से कोरोना नहीं फैलता और पर्यटकों से फैलता है ऐसा कुतर्क मैं नहीं दूंगा, लेकिन उन लोगों को भी बोलने से पहले सोच लेना चाहिए कि जब दूसरी लहर आ रही थी तब लाखों लोगों की भीड़ को आप भी बुला बुला कर इकट्ठा कर रहे थे। क्योंकि वो आपकी रोजी रोटी थी, तो अभी पर्यटन क्षेत्र के लोगों की भी रोजी रोटी का सवाल है महोदय। इसलिए बेहतर ये होगा कि पर्यटन व पर्यटकों को नए रूप और परिवेश में ढालकर इस क्षेत्र को बचाने के बारे में सोचें न कि बंद करके। अब कोरोना यहीं रहने वाला है, ये लहरें आती ही रहेंगी। हर दूसरे महीने नई लहर के डर से लोगों को घरों में बिठाकर कब तक रख पाओगे।

