Saturday, 1 October 2016

आदमखोर बाघ के क्षेत्र में ट्रैकिंग


एक बचपन की याद शेयर कर रहा हूँ आप सभी के साथ... शायद सन 1993-94 की बात है। मैं ग्रेजुएशन कर रहा था, पहाड़ों में हल्की सर्दियाँ शुरू हो चुकी थी। पहाड़ों में  सर्दियाँ शुरू होने का मतलब होता है दिन जल्दी ढलना, मैं और मेरा दोस्त कम चाचा श्रीनगर से कल्जीखाल पहुँचे पिताजी से मिलने, जहाँ पिताजी प्राध्यापक के रूप में कार्यरत थे। 


एक रात पिताजी के पास रुके अगले दिन सुबह आठ बजे की बस से गाँव के लिए निकल लिए। ऐसे तो कल्जीखाल से मेरे गाँव की दूरी 50 किलोमीटर होगी, लेकिन पहाड़ों में सीमित बस होने के कारण इस दूरी को तय करने के लिए कम से कम छह घण्टे चाहिए होते हैं। लगभग 11 बजे हम सतपुली पहुँचे। ऐसे ही बाजार में टहल रहे थे तभी एक वीडियो हॉल दिखा। हां जी तब पहाड़ों में सिनेमा हाल तो होते नहीं थे, वीडियो पर एक कमरे में दो-दो रूपये लेकर फ़िल्म दिखाई जाती थी। अजय देवगन की कोई फ़िल्म का नाम देखकर जी ललचा गया। 

चार रूपये देकर हम दोनों घुस गए फ़िल्म देखने। तीन बजे फ़िल्म समाप्त हुई तो बाहर निकल रहे थे। तभी देखा धर्मेन्द्र की कोई ताज़ी-ताज़ी फ़िल्म का नाम वीडियो हाल वाला अपने ब्लैक बोर्ड पर खड़िया से लिख रहा है। मैंने चाचा की ओर देखा, उसने मेरी ओर। फिर आँखों-आँखों में ही तय हो गया कि इसको भी देख ही लिया जाए। देख डाली फ़िल्म। शाम के छह बजे जैसे ही वीडियो हाल से बाहर निकले, अँधेरा छाने लगा था। आखिरी बस कोटद्वार की जाती हुई दिखी, उसको सीटी बजाकर रुकवाया और लद गए बस में। 

19 किलोमीटर आगे गुमखाल में उतर गए, तब तक घुप्प अँधेरा हो चुका था। गाँव अभी भी 19 किलोमीटर दूर था। कोई बस आगे के लिए नहीं मिलेगी, न ही कोई जीप। सिर्फ एक ही रास्ता बचता है कि पैदल जाओ। एक्का-दुक्का दुकानें खुली थी, उन्होंने सलाह दी कि यहीं जैसे-तैसे रात काट लो, सुबह सात बजे पहली टैक्सी से चले जाना। अगले बारह किलोमीटर में आदमखोर बाघ का आतंक है, हाल में ही कई लोगों पर अटैक कर चुका है। लेकिन हम दोनों कहाँ किसी आदमखोर बाघ से डरने वाले थे। 

19 किलोमीटर ही तो है। चार घण्टे में नाप लेंगे..... निकल पड़े पैदल ही। बाघ या कोई भी जंगली जानवर तभी आक्रमण करता है जब कभी आप अचानक से उसके सामने आ जाते हैं। अँधेरे में आवाज़ें निकालते हुए हम चलते गए। बेवजह चिल्लाते, जोर जोर से आवाज़ें करते। जिससे कोई जानवर आस-पास हो तो दूर चला जाए। ऐसा करते-करते रात के एक बजे हम गाँव पहुँच गए। 

पहाड़ों पर अँधेरे में चलने के कुछ पहाड़ी नियम हैं। उनको फॉलो कीजिये, यक़ीन मानिये कोई भी जानवर आस-पास नहीं फटकेगा। जितनी चिन्ता हमको खुद की जान की होती है, उससे कई गुना ज्यादा जानवरों को खुद की जान की होती है। उनके ढंग से सोचिये, और एन्जॉय कीजिये वाइल्ड लाइफ का। :) 

(फ़ोटो: मनु प्रकाश त्यागी)

9 comments:

  1. ज्ञानवर्धक जानकारी।

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  2. लिखते तो आप बहुत डूब कर हैं किसी भी यात्रा वृत्तांत या संस्मरण को, और यह पोस्ट भी इसकी अपवाद नही! पर, छोटी है बहुत ही ज्यादा! यहाँ रोमाँच का आगमन होने की जैसे ही कुछ आहट हुई, वहीँ पर पोस्ट समाप्त हो गई!
    खैर, उम्मीद है जल्द ही आगे का भाग आएगा 💐

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  3. बीनू भाई जी रस्ते मैं बाघ तो कहीं मिला ही नहीं
    ज़बरदस्त लिखा है मज़ा आ गया

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  4. बहुत बढ़िया बीनू भाई ऐसी यादें लिखते रहो।

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  5. शानदार वर्णन बीनू भाई। मज़ा आ गया

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  6. बाघ तो बेचारा भूखा रह गया होगा । :P

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  7. Gawn ki photo dekhker mujhe apne nanihaal yaad aa gaya, bachpan ki yado me chala gaya.

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