Sunday, 2 October 2016

देवभूमि में आपका स्वागत है



देवभूमि में आपका स्वागत है

जब भी आप उत्तराखण्ड या हिमाचल में किसी भी क्षेत्र से प्रवेश करते हैं, तो एक बड़ा सा बोर्ड सड़क के बीचों-बीच अक्सर दिखेगा "देवभूमि में आपका स्वागत है"। क्या है देवभूमि ? क्या जगह-जगह खूबसूरत जगहों पर मन्दिरों का होना ही देवभूमि है ? क्या ऊंची-ऊंची चोटियों पर देवस्थान होना ही देवभूमि है ? ये विषय विचारणीय है। 


कभी मौका मिले तो पहाड़ के ठेठ गाँव में कुछ रातें गुजार के इस विषय को महसूस कीजियेगा। हो सके तो अगर आपका कोई पहाड़ी दोस्त है तो उसको पूछियेगा कि तेरे गाँव में कोई सामूहिक पूजा का कार्यक्रम कब हो रहा है ? अगर समय हो तो जाकर ऐसे कार्यक्रमों को देखिएगा। वहां के ट्रेडिसन को ज्यादा करीब से जान पायेंगे। देहरादून, अल्मोड़ा, नैनीताल, मसूरी, शिमला, कुल्लू, मनाली ही घूम आए तो इसका कतई ये मतलब नहीं कि आप पहाड़ घूम आए। असल में आप हिल स्टेशन से ज्यादा कुछ देख ही नहीं पाये हो फिर तो। 

मैं कतई अन्धविश्वाशी नहीं हूँ। ना ही मेरा परिवार और ना ही मेरा गाँव। क्योंकि मेरे गाँव की शाक्षरता लगभग 90 फीसदी है। फिर भी गाँव जाता हूँ तो इन पुजाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता हूँ। क्योंकि देवभूमि है...

एक उदहारण देता हूँ। गाँव में हमारे दो घर हैं। एक गाँव के बीचों बीच, दूसरा गाँव से लगभग 2 किलोमीटर नीचे घने जंगल में। जंगल वाले घर में सिर्फ दो परिवार रहते हैं। मेरी बुआ की शादी थी, बारात जंगल वाले घर में पहुंची। पूरा गाँव भी वहीँ शादी के समारोह के लिए आया हुआ था। तभी मेरे ताऊजी के ऊपर अचानक से देवता आया और वो चीखते-चिल्लाते गाँव की ओर रात के अँधेरे में दौड़ पड़े। तब हमारे गाँव में बिजली नहीं थी। मेरे ताऊजी कोई अनपढ़ नहीं हैं। हिन्दी में डॉक्टरेट हैं, और गढ़वाल के हिन्दी साहित्य में उनका नाम मशहूर है। 

जैसे ही ताऊजी गाँव की ओर दौड़े हम कुछ नौजवान उनके पीछे-पीछे पेट्रोमेक्स लेकर दौड़े क्योंकि बीच में घना जंगल पड़ता है। जैसे ही गाँव की सरहद शुरू हुई एक गाँव का कुत्ता अचानक से ताऊजी के पाँव में ऐसे गिड़गिड़ा के पड़ा जैसे हमारे घर का पालतू जानवर हो। जबकि मेरे ताऊजी गाँव में कभी-कभार ही आते थे। ताऊजी ने उसकी पीठ पर हल्के से एक थप्पड़ सी मारकर कहा कि तुम धर्मराज के साथी हो, गाँव की रक्षा भी नहीं कर सकते क्या ? इसी के साथ गाँव के एक घर में जा पहुँचे, जहाँ एक छोठा सा बच्चा अचेत पड़ा हुआ था। उन्होंने उस बच्चे को उठाकर कुछ बातें की चिल्ला-चिल्ला कर। कुछ देर बाद वो बच्चा सामान्य हो गया।

अब सबसे बड़ा प्रश्न ये कि दो किलोमीटर नीचे कैसे किसी इंसान को मालूम पड़ गया कि ऊपर गाँव में किसी बच्चे की अचानक से तबियत ख़राब हो गई ? फिर कुत्ते का ऐसे अचानक पांवों में गिर जाना। कुछ तो है देवभूमि में। जिसको चाहकर भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। 

मेरा ये लिखने का मतलब अन्धविश्वाश को कतई बढ़ावा देना नहीं है। बस जो ये बोर्ड लगा दिखता है कि "देवभूमि में आपका स्वागत है" ये यूँ ही नहीं लगा होता। ऐसी कई आँखों देखी मेरे सामने हुई हैं। समय-समय पर शेयर करता रहूँगा। 

3 comments:

  1. वो तो हम अपने पहाड़ी दोस्त (यानि आपके साथ)जाकर देख ही चुके हैं।सचमुच देवभूमि ही है।आज भी यादों में सोचते हैं तो मन वहीँ पहुँच जाता है।सचमुच अविस्मरणीय।

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  2. इसी तरह का वाकया मैने अपने पिता जी से भी सुना हुआ है। बस जगह थोड़ा अलग थी-अमृतसर, पंजाब।

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  3. देवभूमि की तो बात ही निराली है,हमेशा मन वही जाने को करता है, अब क्यों करता है क्योंकि वहां की वादी, वह की आबोहवा, वहाँ की खूबसूरती, वहा के लोग सब की सब चीजे अपने आप में बेहतरीन है।

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