Thursday, 17 November 2016

डाडामंडी का गेंद का मेला (गिंदी कौथिग), Gend Mela in Uttrakhand

डाडामंडी का गेंद का मेला (गिंदी कौथिग):- 

बचपन की एक याद साझा कर रहा हूँ। जब छोठे थे तो प्रत्येक वर्ष जितना होली, दीवाली और किसी भी त्यौहार का इन्तज़ार रहता था उतना ही या उनसे भी ज्यादा इन्तज़ार होता था डाडामंडी (पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड) में होने वाले गेंद के मेले का। 
प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति को होने वाले इस मेले की तब अदभुत छठा होती थी। कई दिन पहले से मेले में जाने की तैयारी शुरू हो जाती थी। माँ हर साल की तरह अपने हाथों से नया स्वेटर बुन कर रखती थी। उस स्वेटर का उदघाटन भी मेले वाले दिन से ही होता था। एक बार की याद है, मैंने माँ को कहा था कि मुझे इस बार मेले में पहनने के लिए जैकेट चाहिए। माँ ने ऊन की जैकेट ही बुन डाली थी। ठीक जैकेट के जैसी। जिसमे दोनों ओर जेब भी थी जिनमे मूंगफली रख कर खाई जा सकती थी। मैं पूरे मेले में दोनों जेबों में मूंगफली रख कर बड़े गर्व से जैकेट पहन के घूम रहा था।


जलेबी इस मेले का एक अन्य मुख्य आकर्षण है। यकीन मानिये ऐसे तो आपने कई जगह जलेबी खाई होंगी, लेकिन इस मेले की जलेबियों की बात ही निराली है। कई सौ दुकानें तो सिर्फ जलेबियों की ही लगी रहती हैं। कोई भी इस मेले में आए और जलेबी ना खाए ऐसा हो ही नहीं सकता।

गेंद का मेला दो पट्टियों (भटपुड़ी और लंगूर पट्टी) के बीच आयोजित होता है। राजशाही के समय लगान वसूली के लिए गढ़वाल को गढों और पट्टियों में बांटा गया था। तब एक पट्टी में कुछ सौ गाँव आते थे। लंगूर पट्टी और भटपुड़ि पट्टी दोनों की सीमा डाडामंडी से लगती है। कहते हैं पहले इस मेले के लिए जो गेंद बनती थी वो गाय की खाल से बनाई जाती थी और इसके अन्दर गढ़वाल में मिलने वाला एक फल गँदेडु को भरकर इसको रग्बी की गेंद का आकार दे दिया जाता था। इस गेंद का कुल वजन 10 से 15 किलो के आस-पास रखा जाता है। आज के समय बकरे की खाल से इस गेंद को बनाया जाता है। 

इस खेल में खिलाडियों की कोई संख्या निर्धारित नहीं होती, जिस क्षेत्रवासी का मन आया वो गेंद को अपने क्षेत्र में लाने के लिए कूद पड़ता है। कई बार तो देर रात्रि तक भी खेल चलता रहता है। कई सौ लोगों का झुण्ड दोनों ओर से इस गेंद के ऊपर पड़े देखना भी अदभुत क्षण होते हैं।

ऐसे तो उत्तराखण्ड में होने वाले मेलों की भिन्न-भिन्न पौराणिक मान्यताएं होती ही हैं। ऐसे ही इस मेले की भी है। डाडामंडी से पहले ये मेला गढ़वाल के उदयपुर पट्टी में मनाया जाता रहा है। गिदोरि नाम की स्त्री का अपने ससुराल वालों से कुछ कहासुनी हो गई थी तो वो गुस्से में अपने मायके जाने लगी। रास्ते में खेतों में जब उसके मायके के लोग मिले तो उसने अपनी पूरी कहानी उनको सुना डाली। इतने में ससुराल पक्ष के गाँव वाले भी वहां आ पहुँचे। दोनों पक्ष गिदोरि को अपने-अपने पास ले जाना चाहते थे। इसी छीना झपटी में गिदोरि की मृत्यु हो गई। गिदोरि की याद में तब से इस मेले की शुरुआत हुई थी।

दोनों पट्टियों के लोग अपने-अपने ध्वजों और पारंपरिक वाद्य यंत्रो के साथ मेले में हर साल इसी आस में पहुँचते हैं कि इस वर्ष उनकी पट्टी विजयी होगी। गढ़वाल में मेलों को अपने से मिलने का एक अवसर भी कहा जाता था। व्याहता बहनें अपने मायके वालों से मिलने की आस में इस मेले में जरूर जाती थी। एक दूसरे के घर के लिए जलेबी का आदान प्रदान भी जरूर किया जाता था। उस समय स्थानीय लोग जो भी फ़ौज में भर्ती रहते थे, गेंद के मेले के समय ही छुट्टी लेकर घर आते थे। जिससे अपने सभी नाते रिश्तेदारों से एक ही समय पर मुलाकात हो जाए और जरुरत पड़ी तो गेंद लूटने के लिए मेले में कूदा जा सके।

 मेले में लगने वाले झूलों, दुकानों की भी अलग ही रौनक रहा करती थी। डाडामंडी मेले से एक दिन पहले सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता था। हम बचपन में बड़े ही शौक से देखा करते थे। एक बार फेन्सी ड्रेस कार्यक्रम में मैं भी आदिमानव बना था। सर्दियों का समय तो था ही, मैं कपडे उतार कर बारी आने से घंटों पहले ही घास-फूस लगाकर तैयार हो गया। जब तक मेरी स्टेज पर जाने की बारी आती तब तक स्टेज के पीछे ठण्ड से डुगडुगी ही बजती रही। तृत्तीय स्थान मुझे इसमें भाग लेने का मिला था।

उम्मीद करता हूँ मेले की वही पुरानी रौनक बरकार होगी। इस साल भी 14 जनवरी, मकर संक्राति के दिन इसका आयोजन होगा। दिन भी शनिवार पड़ रहा है। ओफ्फिस की भी छुट्टी होगी तो पक्का मन बना लिया है, बचपन की इस याद को फिर से संजोने का।

(कोटद्वार से 20 किलोमीटर दूर डाडामंडी में इस मेले का आयोजन होता है। जो भी मित्र अधिक जानकारी चाहते हैं, कॉमेंट में पूछ सकते हैं। :) )

1 comment:

  1. Great Bro., Its like trip down to memory lane of childhood... your memoir brings tears into eyes... that was the best time now its not that happening due to migration.. but still hope that people like you connecting new generation with there roots... thanks. Deepak Naithani

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