Friday, 19 April 2019

सतोपंथ ताल यात्रा

यात्रा स्वर्ग के रास्ते पर - सतोपंथ ताल यात्रा
उत्तराखंड में स्थित बद्रीनाथ धाम को हर कोई जानता है। साल के छह महीने चलने वाली चार-धाम यात्रा वर्ष 2019 के लिए 7 मई को यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ शुरू हो जाएगी। इस यात्रा को करने के लिए हर वर्ष देश-विदेशों से लाखों श्रद्धालुओं का उत्तराखंड आगमन होता है। इसी यात्रा के लिए लाखों श्रद्धालु बद्रीनाथ धाम भी पहुंचते हैं। 



समुद्र तल से 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बद्रीनाथ धाम से 26 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर पवित्र सतोपंथ ताल पहुंचा जाता है। मान्यता है कि महाभारत युद्ध के पश्चात पांडव गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव को ढूंढ़ते हुए हिमालय में आए। व अपनी अंतिम यात्रा पर इसी मार्ग से गुजरे थे। सर्वप्रथम माणा गांव में द्रोपदी के देहावसान के बाद एक एक कर सभी भाई अपना शरीर त्याग करते रहे व अंत में युधिष्ठिर स्वर्गारोहिणी से होते हुए शशरीर स्वर्ग पहुंचे थे। इसी मार्ग पर पड़ने वाले लक्ष्मीबन में सहदेव, सहस्र धारा में नकुल, चक्रतीर्थ में अर्जुन और सतोपंथ में भीम ने अपना शरीर त्याग दिया था। 

पवित्र सतोपंथ ताल की हिन्दू धर्म में बहुत मान्यता है। कहा जाता है कि इस ताल का जल इतना पवित्र है कि अगर एक तिनका भी इस ताल में फेंका जाए तो यहां विचरण करने वाले पक्षी उस तिनके को ताल से निकाल कर बाहर फेंक देते हैं। तिकोने आकर के इस ताल में पूर्णिमा के दिन त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्वयं स्नान करने हेतु प्रकट होते हैं।

पवित्र सतोपंथ ताल की यात्रा एक कठिन यात्रा मानी जाती है, जिसमें ग्लेशियरों के ऊपर, पथरीले रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। इस यात्रा में पड़ने वाले हर स्थान का अपना पौराणिक महत्व है। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत ग्रंथ की कथा को भगवान गणेश को सुनाया था और वो इसको लिखते रहे। दोनों गुफ़ाएं गणेश गुफा और व्यास गुफा यहां आस पास स्थित है। पवित्र सरस्वती नदी का वेग से पहाड़ों के अंदर से निकलना सिर्फ यहीं देखा जा सकता है। इससे आगे पांच किलोमीटर दूर पवित्र वसुधारा स्थित है। 122 मीटर की ऊंचाई से गिरते इस धारा के जल की कुछ बूंदे भी किसी के  ऊपर भी गिरी उसके पाप धुल जाते हैं, ऐसी यहां की मान्यता है।

कुछ आगे बढ़ने के पश्चात लक्ष्मी वन में भोजपत्र के पेड़ मिलते हैं। यहां से आगे सहस्रधारा में नीलकंठ पर्वत से एक साथ बहती हुई सहस्र धाराओं को देखना आंखो को अचंभित कर देता है। हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के इस मार्ग पर बेहद पास से शानदार दृश्य देखने को मिलते हैं।  सतोपंथ ताल में पुरखों के लिए पूजा अर्चना और तर्पण किया जाता है। अलकनंदा का उदगम इसी ताल से माना जाता है। इससे कुछ आगे पवित्र सूर्य कुण्ड और चन्द्र कुण्ड स्थित हैं। स्वर्ग की ओर जाने वाली सीढ़ियों के यहां से साक्षात दर्शन होते हैं। 

इस यात्रा के लिए बद्रीनाथ धाम पहुंचना होता है। बद्री धाम की यात्रा के साथ ही उत्तराखंड के पांचों प्रयाग के दर्शन साथ में करने को मिल जाते हैं।

सतोपंथ ताल की यात्रा एक कठिन यात्रा है। पूरे मार्ग में रहने और खाने की कोई सुविधा नहीं है। यात्रियों को स्वयं से ही सारी व्यवस्था करनी होती है। यात्रा मार्ग में अधिकांश रास्ता ग्लेशियरों के ऊपर से ही होकर गुजारना होता है। कई स्थानों पर रास्ता बिल्कुल नहीं है, सिर्फ बड़े बड़े बोल्डर के ऊपर से छलांग लगा लगाकर गुजरना होता है। कई जगह गहरे क्रेवास यात्रा के रास्ते पर मिलते हैं। अगर गलती से इनमें गिर जाएं तो जीवन का अंत ही समझो। बिना किसी जानकर व्यक्ति के साथ के इस यात्रा को ना करने की सलाह देता हूं।


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