मेले
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पहाड़ों पर लगने वाले स्थानीय मेलों का एक समय में विशेष महत्व होता था। अब तो आधुनिकता की दौड़ में जहां हर चीज हमारे मोबाइल पर आ गयी है, व ऑन लाइन शॉपिंग कर हम घर बैठे कुछ भी मंगवा सकते हैं। ऐसे में इन मेलों का अस्तित्व कितने दिन और बचा रहता है, ये देखने वाली बात होगी।
शहरों में तो समय के साथ-साथ मेलों ने अपना ढर्रा भी बदल दिया है। बदलना ही पड़ेगा, आधुनिकता की दौड़ में जो बने रहना है। लेकिन सुदूर पहाड़ के गांवों में अभी भी इन मेलों काअस्तित्व कुछ बचा हुआ है।
पहाड़ों पर पहले आवाजाही के साधन इतने सुगम नहीं थे। एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए या तीस-चालीस किलोमीटर दूर जाने के लिए पूरा-पूरा दिन लग जाता था। व्याहता बेटियों को अपने मायके की खबर चिट्ठियों या किसी संदेशवाहक के जरिये ही कभी कभार मिल जाया करती थी। इधर मायके में माँ भी अपनी व्याहता बेटी से मिल पाने की व्याकुलता में इन मेले की बाट जोहती रहती थी। उधर पहाड़ से दूर फौज में भर्ती पिता भी अपने बच्चों से मिलने विशेष रूप से इसी समय छुट्टियों की आस लगाए दिन गिनता रहता था।
ऐसे में इन मेलों का आम जन मानस के मन में विशेष स्थान होना स्वाभाविक ही था। मेले वाले दिन हर एक के चेहरे की रौनक बता देती थी कि आज साल का विशेष दिन है। मेले में सजने वाली दुकानों के दुकानदार भी दूर-दूर तराई वाले क्षेत्रों से अपनी गठरियों में सामान बेचने इस ललक से पहुंचते थे कि उनकी भी खूब आमदनी होगी, और होती भी थी। शायद ही किसी दुकानदार का सामान बच कर वापिस जाता रहा होगा।
लेकिन अब ऐसा कुछ विशेष रहा नहीं। कुछ समय पहले भिलंग घाटी में ट्रैकिंग पर था तो मालूम पड़ा कि नजदीकी बाजार चमियाला में आज मेला लगेगा। मन खुश हो गया कि चलो अच्छे समय पर यहां उपस्थित हूँ। घुत्तू से मेले में जा रहे दुकानदारों की गठरियों के ऊपर बैठकर चमियाला जा पहुंचा। सुबह-सुबह का समय था, अभी बाजार सजने में समय लगेगा, इतने में बीस किलोमीटर दूर बूढ़ा केदार घूम आता हूँ।
वापसी में मेला देखेंगे। बूढ़ा केदार से वापसी के लिए जब कुछ भी साधन नहीं मिला तो एक सामान ढोने वाले मिनी ट्रक में पीछे खड़े होकर चमियाला वापिस आना पड़ा। पूरे ट्रक में बीस-बाईस लोग थे व सभी मेले के लिए ही आ रहे थे। चेहरे पर वही अपनों से मिलने की खुशी साफ दिखाई दे रही थी। ऐसे ये लोग हज़ारों बार चमियाला बाजार घूमे होंगे लेकिन मेले वाले दिन बाजार में घूमने का मजा ही कुछ और होता है।
ऐसे ही नौजवान खूब घूमते मिले। दोपहर को जब भोजन के लिए एक होटल में गए तो एक बुजुर्ग भी आकर हमारी ही मेज पर बैठे गए। कंधे में झोला लटकाए हुए थे। बिना देरी किए झोले से दारू की बोतल निकालकर सटासट चार-पाँच पैग ऐसे खींच डाले कि पूरे साल शायद मेले का ही इंतज़ार था। अपना-अपना तरीका है एन्जॉय करने का। लग नहीं रहा था कि शाम तक बोतल में कुछ बचेगा। खैर, हमको क्या। काफी सालों बाद पहाड़ी मेला देख हम बंजारे आगे बढ़ चले।
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