Friday, 3 November 2017

Who will be travel partner

घूमने के मामले में हर एक इंसान का अपना-अपना तरीका व नजरिया है। किसी को अकेले घूमना पसन्द है तो किसी को दोस्तों के साथ व किसी को परिवार के साथ। जहां तक मेरी बात है, मैं अक्सर दोस्तों के साथ ही घूमने निकलता हूँ। कोशिश रहती है उसके साथ घूमने जाऊं जिससे मेरे विचार, खान-पान, घूमने की चॉइस सभी मेल खाते हों।
मेरी अधिकतर घुमक्कड़ी पहाड़ों व हिमालय की ही होती है तो अधिकतर हिमालय प्रेमी या ट्रैकिंग प्रेमी ही साथ होते हैं। लेकिन जरूरी नहीं होता कि जो हिमालय प्रेमी या ट्रैकिंग प्रेमी हो उससे मेरे विचार मिले ही। ये मैं आम परिपेक्ष्य में कह रहा, जो भी मेरे मित्र हैं वो यह न समझें कि उनमें से किसी के लिए भी यह लिखा है।
असल में जो मुझे खाने में पसन्द है जरूरी नहीं है कि साथी को भी वह पसन्द हो। मुझे मैगी बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती, लेकिन ट्रैकिंग पर मैगी ही वो चीज है जो सीमित संसाधनों में सबसे आसानी से पक जाती है तो मन मारकर ठूंसनी पड़ती है। वहीं कई मित्र बड़े चाव से खाते हैं। वहीं मैं मांसाहारी हूँ, जबकि मेरे कई मित्र खाना तो छोड़ो छूते भी नहीं हैं। कई बार व्यवहार की बात भी सामने आ जाती है। किसी को हंसी मजाक पसन्द है तो किसी को नहीं। कई बार हम सड़क मार्ग से यात्रायें कर रहे होते हैं तो कोई जगह ऐसी दिख जाती है जहां रुकने का मन करता है, लेकिन जरूरी नहीं होता कि आपके साथी का वहां रुकने का मन करे।
परिवार के साथ जो लोग यात्राएं करते हैं उन्हें तो शायद ही इस प्रकार की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता होगा, लेकिन जो अक्सर किसी न किसी मित्र के साथ यात्रा करते हैं उन्हें इस प्रकार की परिस्थितियों का अनुभव अवश्य होगा।
मेरी नजर में एक घुमक्कड़ को हर परिस्थिति में स्वयं को ढालने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए।अगर थोड़े से स्वयं के साथ समझौते से अपने साथी से किसी भी प्रकार के वाद विवाद से बचा जाए तो घूमने का आनन्द कई गुना बढ़ जाता है। अगर यात्रा के दौरान किसी भी साथी से थोड़ा सा भी वाद-विवाद हो जाए तो घूमने का कभी भी आप सही से आनन्द नहीं ले पाएंगे।
अक्सर वाद-विवाद शुरू भी छोटी-छोटी और बचकानी बातों से ही होता है। अगर थोड़ा सा झुकने से व साथी की इच्छा का सम्मान करने से यात्रा सुखद हो सकती है तो कर लेना चाहिए। जैसा मैं कह चुका कि एक घुमक्कड़ को समझौतावादी होना ही चाहिए, फिर भी कहीं भी किसी के साथ भी घूमने जाएं तो कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
1. साथी की राय का सम्मान करें, अपनी बात को जबरदस्ती थोपने के बजाय उसको सहमत करवाएं। 

2. अगर साथी को कुछ खाने से परहेज है तो उसका सम्मान करें।

3. आपकी किसी बात से साथी गुस्सा है तो उसके गुस्से को शांत होने देने का इंतजार कीजिये न कि बहसबाजी में पड़ें। 

4. राजनीतिक चर्चा कभी न करें। सबसे ज्यादा लड़ाई इसी को लेकर होती हैं। 

5. थोड़ा झुकने से बात बन सकती है तो झुकने में कोई हर्ज नहीं। चाहे आपके विचार भिन्न हों।

6. खर्च का पूरा हिसाब रखें व आपस मे बराबर बाटें। 

7. जाति, धर्म, धार्मिक भावनाओं पर टिप्पणियों से बचें। 

8. सबसे अच्छा तो यह है कि यात्रा उसी के साथ करें जिससे विचार मिलते हों, और जिससे आप पहले से भलीभांति परिचित हों। अगर विचार नहीं मिलते तो साथ घूमने का कोई औचित्य नहीं है।

Sunday, 30 July 2017

कोसी नदी

कोसी नदी



रामनगर के नजदीक जिम कार्बेट नेशनल पार्क जो भी घूमने जाता है तो गर्जिया देवी मन्दिर में दर्शन हेतु जरूर जाता है। साथ ही कोसी को भी जरूर निहारता है। कोसी नदी की विशेषता है कि इसका किसी भी नदी में संगम नहीं होता। इस नदी के पीछे किंवदन्ती है कि ये सात बहनें थीं। भागीरथी, यमुना, सरयू, रामगंगा, काली, गोरी और कोसी। ये सातों बहनें आपस में खूब हंसी ठिठोली करती और साथ-साथ खेलती थी। एक बार सातों बहनों ने निश्चय किया कि हम सभी साथ-साथ निकलेंगी और बीच में सभी एक दूसरे के साथ ही चलेंगी। जब चलने की बारी आई तो कोसी सबसे पहले पहुँच गई। उसने देखा अभी बाकी छह बहने नहीं आई तो अकेले ही आगे निकल पड़ी। जब बाकी छह बहने उस स्थान पर एक साथ पहुंची जहाँ से निकलना था तो देखा कोसी वहां पर नहीं है और आगे निकल चुकी है। छहों बहनों ने गुस्से में कोसी को श्राप दे दिया कि तू हमेशा अकेले ही बहेगी हमको कभी नहीं मिलेगी, तू बहुत आवाज करेगी, तुझमें मनुष्य बहेंगे और तू किसी में नहीं समाएगी।

बरसात के मौसम में यात्रा और सावधानियां

 बरसात और पहाड़


दोस्तों बरसात का मौसम जैसे ही आता है, चारों ओर से खबरें आने लगती हैं कि यहां बाढ़ आयी है, कहीं लैंड स्लाइड हो गया है, कहीं मकान ढह गये हैं तो कहीं सड़कें बन्द पड़ी हैं आदि आदि। कुल मिलाकर अधिकतर खबरें डरावनी ही होती हैं। ऐसे में लगता है कि कहीं घूमने जाने की सोचना ही बेवकूफी है। कुछ हद तक सही भी है, लेकिन पूर्ण रूप से नहीं। 

Friday, 20 January 2017

कंडाली उर्फ़ बिच्छु घास (Nettle)

कंडाली उर्फ़ बिच्छु घास (Nettle)



पहाड़ों में जो भी मित्र गए हैं उनका पाला इस बूटी से जरूर पड़ा होगा। बहुमुखी प्रतिभा की ये बूटी जितना अपने पास आने से डराती है उतनी ही बहुमूल्य बूटी है। इसके बहुमुखी प्रतिभा के होने के कुछ तथ्य इस प्रकार हैं :-

Saturday, 19 November 2016

रिंगाल (मधुमक्खी) का पेथण (छत्ता)

रिंगाल (मधुमक्खी) का पेथण (छत्ता)
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गाँव में हमारे घर में एक दीवार पर सामान रखने के लिए बड़ा सा छेद बनाया जाता है। पहाड़ के घरों की दीवारें काफी चौड़ी होती हैं, जिससे उस छेद में काफी सामान आ जाता है। जिसको गढ़वाली में "आला" कहते हैं। उस आले के अन्दर भी एक छोठा सा छेद था जो दीवार के आर-पार था।

Thursday, 17 November 2016

डाडामंडी का गेंद का मेला (गिंदी कौथिग), Gend Mela in Uttrakhand

डाडामंडी का गेंद का मेला (गिंदी कौथिग):- 

बचपन की एक याद साझा कर रहा हूँ। जब छोठे थे तो प्रत्येक वर्ष जितना होली, दीवाली और किसी भी त्यौहार का इन्तज़ार रहता था उतना ही या उनसे भी ज्यादा इन्तज़ार होता था डाडामंडी (पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड) में होने वाले गेंद के मेले का। 
प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति को होने वाले इस मेले की तब अदभुत छठा होती थी। कई दिन पहले से मेले में जाने की तैयारी शुरू हो जाती थी। माँ हर साल की तरह अपने हाथों से नया स्वेटर बुन कर रखती थी। उस स्वेटर का उदघाटन भी मेले वाले दिन से ही होता था। एक बार की याद है, मैंने माँ को कहा था कि मुझे इस बार मेले में पहनने के लिए जैकेट चाहिए। माँ ने ऊन की जैकेट ही बुन डाली थी। ठीक जैकेट के जैसी। जिसमे दोनों ओर जेब भी थी जिनमे मूंगफली रख कर खाई जा सकती थी। मैं पूरे मेले में दोनों जेबों में मूंगफली रख कर बड़े गर्व से जैकेट पहन के घूम रहा था।

Monday, 14 November 2016

My Trekking Shoes मेरे ट्रैकिंग जूते


ट्रैकिंग जूतों के बारे में मेरी राय :-



ऐसे तो ट्रैकिंग अपने आप में बहुत बड़ा विषय है, साथ ही इसके लिए प्रयुक्त होने वाली सामग्री भी भिन्न-भिन्न प्रकार की हैं। बाजार में कई प्रकार के ब्रांड उपलब्ध हैं, लेकिन मैं स्वयं जो भी सामान ट्रैक के लिए उपयोग करता हूँ, उसके अनुभव साझा करना चाहता हूँ।