Thursday, 15 July 2021

पर्यटन, पर्यटन स्थलों पर भीड़, मीडिया और सरकारी तंत्र

 पर्यटन, पर्यटन स्थलों पर भीड़, मीडिया और सरकारी तंत्र

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दोस्तों आजकल मीडिया से लेकर राजनेता और जिसे भी देखो पर्यटन स्थलों की भीड़ पर ज्ञान दिए जा रहे हैं। चूंकि मैं स्वयं पर्यटन व्यवसाय से जुड़ा हूँ, और जबसे यह कोरोना महामारी आई है तबसे पहाड़ों पर रहा हूँ, इसलिए इस सेक्टर की मूलभूत परिस्थितियों से अच्छे से वाकिफ हूँ। 


मैं इन सब बातों से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ, क्योंकि बिना सोचे व बिना जाने घर के अंदर से बैठकर ज्ञान देने वाले क्या ही समझेंगे इसकी कल्पना कर सकता हूँ।


पर्यटन एक बहुत ही विस्तृत क्षेत्र है, लेकिन मैं एक छोटे से उदाहरण के साथ अपने पॉइंट को समझाने का प्रयास करूंगा। अक्सर आप लोग ऋषिकेश से आगे पहाड़ों पर गए होंगे, सबसे पहले व्यासी में कुछ भोजनालय हैं, फिर तीन धारा व आगे देवप्रयाग, जहां अक्सर यात्री य्या पर्यटक भोजन करते हैं। सिर्फ पर्यटकों व यात्रियों से इस क्षेत्र के कितने गांवों के घरों की रोजी रोटियां चलती हैं जरा इसका आकलन कीजिये। बाकी आगे बद्रीनाथ या केदारनाथ तक का सोचिए। और असल स्थिति जाननी है तो उनकी आज की हालत भी देख लीजिए। दो साल हो गए हैं, कोई। एक दो महीना नहीं जो कि गुजारा जैसे तैसे कर लें। आपको दो महीने तनख्वाह न मिले और दो साल तक न मिले तो स्वयं की स्थिति क्या होगी जरा एक बार सोचिएगा।


एक पर्यटक घर से बाहर निकलता है तो उससे कितनों का घर चलता है और जहां जहां से वो गुजरता है वहां की अर्थव्यवस्था कैसे दौड़ती है इसको समझिए। पर्यटक पहाड़ों पर जाएगा तो गरम कपड़े भी खरीदेगा, कपड़ा व्यवसाय को फर्क पड़ेगा। गाड़ी में पेट्रोल, डीजल भी डालेगा, सरकार को सीधा आर्थिक लाभ। सड़क से जहां से भी गुजरेगा उसके किनारे स्थित ढाबों, होटल को लाभ। सड़क पर टोल टैक्स भरेगा, जहां रुकेगा वहां होटल मालिक से लेकर सभी कर्मचारियों का जीवन यापन। हिल स्टेशन पर घूमेगा तो रेडी वालों, घोड़े वाले व जो अन्य लोग सीधे पर्यटन व्यवसाय से जुड़े हैं उनकी आर्थिकी सभी कुछ पर असर पड़ता है। 


ये भी सर्व विदित है कि महामारी के इस दौर में सबसे अधिक कुछ प्रभावित हुआ है तो पर्यटन ही प्रभावित हुआ है। पर्यटन का नाम सुनते ही हमारे जेहन में सिर्फ होटल और उनके मालिक को होने वाले लाभ ही मन मे आता है, लेकिन हम भूल जाते हैं बाकी अन्य को, जो और इससे प्रभावित होते हैं उनके लिए शायद ही किसी ने सोचा हो। 


क्या पिछले दो वर्ष में किसी भी सरकार ने या व्यक्ति ने पर्यटन क्षेत्र के लिए कुछ सोचा है ? रत्ती भर भी नहीं, और बाकी सबके लिए सोचा तो क्या कोरोना को रोक पाए ? एक इंसान से शुरू हुआ ये वायरस आज पूरे विश्व में फैला पड़ा है। अगर कुछ बन्द करने से रुकना होता तो शुरू में ही रुक चुका होता। फिर ऐसे में आवश्यक क्या है ? क्या फिर से पर्यटन बन्द कर दें ? क्योंकि आज तक के ट्रेंड से तो सबसे पहले पर्यटन को ही बंद किया गया है। बन्द करना समाधान कतई नहीं है, अब आवश्यक है कि पर्यटकों को नए तरीके से व वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार जिम्मेदारी के साथ घर से बाहर निकल कर घूमने जाना होगा। अब वो सब हरकतें हमको बन्द करनी होंगी जो घूमते हुए पहले किया करते थे। कुछ भी खा कर कहीं भी फेंक देना, पानी की बोतलें सड़क किनारे फेंक देना ये सब बन्द कर जिम्मेदारी निभाकर घूमने निकलें तो उसमें किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए।


रही बात पर्यटक स्थलों पर क्राउड कंट्रोल तो ये सरकार व प्रशाशन को देखना होगा। अमरनाथ यात्रा में प्रशासन क्राउड कंट्रोल मैनेजमेंट का सहारा आज तक लेती आई है, उससे सीखकर ये सब किया जा सकता है। आप इस बारे में कुछ न सोचकर सीधा सीधा पर्यटकों पर चिल्लम पों करें और तीसरी लहर का रोना रोते रहें तो यकीन मानिए जो बची खुची कमर पर्यटन क्षेत्र की बची है उसको टूटने में एक महीना नहीं लगेगा। 


बाकी राजनीतिक रैलियों की भीड़ से कोरोना नहीं फैलता और पर्यटकों से फैलता है ऐसा कुतर्क मैं नहीं दूंगा, लेकिन उन लोगों को भी बोलने से पहले सोच लेना चाहिए कि जब दूसरी लहर आ रही थी तब लाखों लोगों की भीड़ को आप भी बुला बुला कर इकट्ठा कर रहे थे। क्योंकि वो आपकी रोजी रोटी थी, तो अभी पर्यटन क्षेत्र के लोगों की भी रोजी रोटी का सवाल है महोदय। इसलिए बेहतर ये होगा कि पर्यटन व पर्यटकों को नए रूप और परिवेश में ढालकर इस क्षेत्र को बचाने के बारे में सोचें न कि बंद करके। अब कोरोना यहीं रहने वाला है, ये लहरें आती ही रहेंगी। हर दूसरे महीने नई लहर के डर से लोगों को घरों में बिठाकर कब तक रख पाओगे।

Friday, 19 April 2019

सतोपंथ ताल यात्रा

यात्रा स्वर्ग के रास्ते पर - सतोपंथ ताल यात्रा
उत्तराखंड में स्थित बद्रीनाथ धाम को हर कोई जानता है। साल के छह महीने चलने वाली चार-धाम यात्रा वर्ष 2019 के लिए 7 मई को यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ शुरू हो जाएगी। इस यात्रा को करने के लिए हर वर्ष देश-विदेशों से लाखों श्रद्धालुओं का उत्तराखंड आगमन होता है। इसी यात्रा के लिए लाखों श्रद्धालु बद्रीनाथ धाम भी पहुंचते हैं। 

Friday, 3 November 2017

Adventure Activity and Games

एडवेंचर एक्टिविटी (साहसिक खेल) व सुरक्षा
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पिछले कुछ वर्षों में पर्यटन, साहसिक खेलों व एडवेंचर एक्टिविटी की ओर युवाओं का रुझान बहुत ही तेजी से बढ़ा है। अच्छी बात है, इसके कई फायदे हैं। कोई भी एडवेंचर एक्टिविटी होगी वो निश्चित रूप से कई तरीकों से आपकी शारीरिक व मानसिक स्वस्थता की परीक्षा लेगी ही। इससे स्वयं के शरीर के बारे में अच्छे से जानने का मौका भी मिल जाता है कि आप कितने गहरे पानी में हैं। कुछ लोग जानने के बाद कोई बहाना बनाकर चुप बैठ जाएंगे, कुछ अपने शरीर की कमियों को दूर कर बेहतर करने का प्रयास करेंगे।

साहसिक पर्यटन के क्षेत्र में उत्तराखण्ड अपनी विशेष पहचान बना रहा है। राफ्टिंग को नई दिशा देने में ऋषिकेश का महत्वपूर्ण योगदान है। हालांकि राफ्टिंग की वजह से आज के समय ऋषिकेश कितना परेशान है, ये वहां के निवासी ही बता देंगे। हर सप्ताहांत में वहां जाम से जूझते स्थानीय निवासी राफ्टिंग वालों को कोसते हुए आसानी से मिल जाएंगे। लेकिन सुनियोजित तरीके से इस पर कार्य किया जाए तो पर्यटक इसका भरपूर आनन्द उठा सकते हैं।
ऋषिकेश से थोड़ा ऊपर की ओर पहाड़ों पर चलें तो जगह-जगह आपको कैम्प साइट दिख जाएंगी, जो पूरी तरह से एडवेंचर एक्टिविटी के लुभावने बैनर के साथ आपका स्वागत करने को तैयार मिलेंगी। इनके बैनर को देखकर मन ललचाए बिना रह नहीं पाता। लोग ललचाते भी हैं, और इनके पास जाते भी हैं। अच्छी बात है, पर्यटक जाएंगे तो उनकी कुछ आमदनी भी होगी व रोजगार भी मिलेगा।
थोड़ा और ऊपर पहाड़ों पर जाएंगे तो ट्रैकरों के ग्रुप आपको ट्रैकिंग के लिए जाते हुए आसानी से दिख जाएंगे। ट्रैकिंग ही एक ऐसा माध्यम है कि जिससे उत्तराखण्ड के सुदूर गांवों में सीधे व्यावसायिक गतिविधि होती है। अन्यथा साल भर वहां आमदनी का कोई बाहरी जरिया है भी नहीं।
अब जब साहसिक पर्यटन के क्षेत्र में इस राज्य में अथाह संभावनाएं हैं तो निश्चित रूप से लोगों का यहां आना बढ़ेगा ही। चूंकि मेरा ग्रह राज्य है, तो मेरे लिए खुशी की बात तो होगी ही। लेकिन दुख की बात तब होती है, जब आये दिन अखबारों में या जानकारों से मालूम पड़ता है कि यहां ट्रैक पर ये दुर्घटना हो गयी, वहां राफ्टिंग में इतने डूब गए आदि-आदि।
अगर आप कहीं भी किसी भी साहसिक खेल या एक्टिविटी के लिए निकलते हैं तो कुछ मूल बातों का विशेष ध्यान रखें।
1. जहां एडवेंचर शब्द जुड़ गया वहां जान का भी खतरा है। सोच समझकर ही एक्टिविटी का चुनाव करें व किसी भी एडवेंचर एक्टिविटी को कभी भी हल्के में न लें.
2. जिस भी कम्पनी का आप पैकेज ले रहे हैं, क्या वो आपको अनुभवी व सत्यापित गाइड साथ में दे रहे हैं ? सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है। अगर पहाड़ों में या किसी भी एक्टिविटी में आप मुसीबत में पड़ते हैं तो यही व्यक्ति आपका जीवन रक्षक होगा।
3. किसी भी एक्टिविटी का चुनाव करने से पहले उसके बारे में अच्छे से जानकारी ले लें। इंटरनेट पर हर प्रकार की जानकारी उपलब्ध है।
4. आपका गाइड ही आपका जीवन रक्षक होगा इसलिए गाइड द्वारा बताई एक एक बात को गांठ बांध कर उसका पालन करें।
5. प्रकृति से टकराने की भूल कभी न करें। आप प्रकृति के समक्ष एक चींटी के बराबर भी नहीं हैं। इस बात को सदैव ध्यान में रखें।
6. कोई भी डेयर डेविल की हरकत आपकी जिंदगी खतरे में डाल सकती है। ऐसा कुछ भी न करें जिससे आपका जीवन खतरे में पड़ जाए।
7. उसने वो किया, मैं उससे बढ़कर करूँगा। इस लालच से दूर रहकर जो शारीरिक क्षमता आपकी है, उसी में रहकर आनन्द लें।
8. कोई भी एक्टिविटी शुरू करने से पहले आपका गाइड आपको सारी जानकारी देता है, एकाग्रचित होकर उन्हें सुनें, समझें व उनका पालन करें।
9. किसी भी सस्ते पैकेज की ओर आकर्षित होने से पहले ये जरूर जांच लें कि उसमें आपकी सुरक्षा के लिए क्या-क्या सुविधाएं दी गयी हैं। अच्छा भोजन क्या मिल रहा है, इस पर लालच न करें। अच्छा भोजन आप किसी भी अच्छे रेस्टोरेंट में बैठकर भी कर सकते हैं। वहां आप उस एक्टिविटी के लिए गए हैं, न कि सुख-सुविधाओं के लिए। इसलिए सुरक्षा के मानक जरूर जांच लें।
और भी बहुत कुछ है जो समय-समय पर लिखता ही रहूंगा। आपका जीवन अमूल्य है, इसको ऐसी किसी भी छोटी सी लापरवाही से खतरे में न डालें। ट्रैकिंग व एकल ट्रैकिंग के इच्छुक जो भी लोग हैं व पहली बार जाना चाहते हैं, शीघ्र ही एक पोस्ट उनके लिए भी लिखूंगा।
"खूब घुमक्कड़ी हो लेकिन सुरक्षित घुमक्कड़ी हो"

Uttrakhand Local Fair

मेले
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पहाड़ों पर लगने वाले स्थानीय मेलों का एक समय में विशेष महत्व होता था। अब तो आधुनिकता की दौड़ में जहां हर चीज हमारे मोबाइल पर आ गयी है, व ऑन लाइन शॉपिंग कर हम घर बैठे कुछ भी मंगवा सकते हैं। ऐसे में इन मेलों का अस्तित्व कितने दिन और बचा रहता है, ये देखने वाली बात होगी।

शहरों में तो समय के साथ-साथ मेलों ने अपना ढर्रा भी बदल दिया है। बदलना ही पड़ेगा, आधुनिकता की दौड़ में जो बने रहना है। लेकिन सुदूर पहाड़ के गांवों में अभी भी इन मेलों काअस्तित्व कुछ बचा हुआ है।
पहाड़ों पर पहले आवाजाही के साधन इतने सुगम नहीं थे। एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए या तीस-चालीस किलोमीटर दूर जाने के लिए पूरा-पूरा दिन लग जाता था। व्याहता बेटियों को अपने मायके की खबर चिट्ठियों या किसी संदेशवाहक के जरिये ही कभी कभार मिल जाया करती थी। इधर मायके में माँ भी अपनी व्याहता बेटी से मिल पाने की व्याकुलता में इन मेले की बाट जोहती रहती थी। उधर पहाड़ से दूर फौज में भर्ती पिता भी अपने बच्चों से मिलने विशेष रूप से इसी समय छुट्टियों की आस लगाए दिन गिनता रहता था।
ऐसे में इन मेलों का आम जन मानस के मन में विशेष स्थान होना स्वाभाविक ही था। मेले वाले दिन हर एक के चेहरे की रौनक बता देती थी कि आज साल का विशेष दिन है। मेले में सजने वाली दुकानों के दुकानदार भी दूर-दूर तराई वाले क्षेत्रों से अपनी गठरियों में सामान बेचने इस ललक से पहुंचते थे कि उनकी भी खूब आमदनी होगी, और होती भी थी। शायद ही किसी दुकानदार का सामान बच कर वापिस जाता रहा होगा।
लेकिन अब ऐसा कुछ विशेष रहा नहीं। कुछ समय पहले भिलंग घाटी में ट्रैकिंग पर था तो मालूम पड़ा कि नजदीकी बाजार चमियाला में आज मेला लगेगा। मन खुश हो गया कि चलो अच्छे समय पर यहां उपस्थित हूँ। घुत्तू से मेले में जा रहे दुकानदारों की गठरियों के ऊपर बैठकर चमियाला जा पहुंचा। सुबह-सुबह का समय था, अभी बाजार सजने में समय लगेगा, इतने में बीस किलोमीटर दूर बूढ़ा केदार घूम आता हूँ।
वापसी में मेला देखेंगे। बूढ़ा केदार से वापसी के लिए जब कुछ भी साधन नहीं मिला तो एक सामान ढोने वाले मिनी ट्रक में पीछे खड़े होकर चमियाला वापिस आना पड़ा। पूरे ट्रक में बीस-बाईस लोग थे व सभी मेले के लिए ही आ रहे थे। चेहरे पर वही अपनों से मिलने की खुशी साफ दिखाई दे रही थी। ऐसे ये लोग हज़ारों बार चमियाला बाजार घूमे होंगे लेकिन मेले वाले दिन बाजार में घूमने का मजा ही कुछ और होता है।
ऐसे ही नौजवान खूब घूमते मिले। दोपहर को जब भोजन के लिए एक होटल में गए तो एक बुजुर्ग भी आकर हमारी ही मेज पर बैठे गए। कंधे में झोला लटकाए हुए थे। बिना देरी किए झोले से दारू की बोतल निकालकर सटासट चार-पाँच पैग ऐसे खींच डाले कि पूरे साल शायद मेले का ही इंतज़ार था। अपना-अपना तरीका है एन्जॉय करने का। लग नहीं रहा था कि शाम तक बोतल में कुछ बचेगा। खैर, हमको क्या। काफी सालों बाद पहाड़ी मेला देख हम बंजारे आगे बढ़ चले।

Who will be travel partner

घूमने के मामले में हर एक इंसान का अपना-अपना तरीका व नजरिया है। किसी को अकेले घूमना पसन्द है तो किसी को दोस्तों के साथ व किसी को परिवार के साथ। जहां तक मेरी बात है, मैं अक्सर दोस्तों के साथ ही घूमने निकलता हूँ। कोशिश रहती है उसके साथ घूमने जाऊं जिससे मेरे विचार, खान-पान, घूमने की चॉइस सभी मेल खाते हों।
मेरी अधिकतर घुमक्कड़ी पहाड़ों व हिमालय की ही होती है तो अधिकतर हिमालय प्रेमी या ट्रैकिंग प्रेमी ही साथ होते हैं। लेकिन जरूरी नहीं होता कि जो हिमालय प्रेमी या ट्रैकिंग प्रेमी हो उससे मेरे विचार मिले ही। ये मैं आम परिपेक्ष्य में कह रहा, जो भी मेरे मित्र हैं वो यह न समझें कि उनमें से किसी के लिए भी यह लिखा है।
असल में जो मुझे खाने में पसन्द है जरूरी नहीं है कि साथी को भी वह पसन्द हो। मुझे मैगी बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती, लेकिन ट्रैकिंग पर मैगी ही वो चीज है जो सीमित संसाधनों में सबसे आसानी से पक जाती है तो मन मारकर ठूंसनी पड़ती है। वहीं कई मित्र बड़े चाव से खाते हैं। वहीं मैं मांसाहारी हूँ, जबकि मेरे कई मित्र खाना तो छोड़ो छूते भी नहीं हैं। कई बार व्यवहार की बात भी सामने आ जाती है। किसी को हंसी मजाक पसन्द है तो किसी को नहीं। कई बार हम सड़क मार्ग से यात्रायें कर रहे होते हैं तो कोई जगह ऐसी दिख जाती है जहां रुकने का मन करता है, लेकिन जरूरी नहीं होता कि आपके साथी का वहां रुकने का मन करे।
परिवार के साथ जो लोग यात्राएं करते हैं उन्हें तो शायद ही इस प्रकार की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता होगा, लेकिन जो अक्सर किसी न किसी मित्र के साथ यात्रा करते हैं उन्हें इस प्रकार की परिस्थितियों का अनुभव अवश्य होगा।
मेरी नजर में एक घुमक्कड़ को हर परिस्थिति में स्वयं को ढालने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए।अगर थोड़े से स्वयं के साथ समझौते से अपने साथी से किसी भी प्रकार के वाद विवाद से बचा जाए तो घूमने का आनन्द कई गुना बढ़ जाता है। अगर यात्रा के दौरान किसी भी साथी से थोड़ा सा भी वाद-विवाद हो जाए तो घूमने का कभी भी आप सही से आनन्द नहीं ले पाएंगे।
अक्सर वाद-विवाद शुरू भी छोटी-छोटी और बचकानी बातों से ही होता है। अगर थोड़ा सा झुकने से व साथी की इच्छा का सम्मान करने से यात्रा सुखद हो सकती है तो कर लेना चाहिए। जैसा मैं कह चुका कि एक घुमक्कड़ को समझौतावादी होना ही चाहिए, फिर भी कहीं भी किसी के साथ भी घूमने जाएं तो कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
1. साथी की राय का सम्मान करें, अपनी बात को जबरदस्ती थोपने के बजाय उसको सहमत करवाएं। 

2. अगर साथी को कुछ खाने से परहेज है तो उसका सम्मान करें।

3. आपकी किसी बात से साथी गुस्सा है तो उसके गुस्से को शांत होने देने का इंतजार कीजिये न कि बहसबाजी में पड़ें। 

4. राजनीतिक चर्चा कभी न करें। सबसे ज्यादा लड़ाई इसी को लेकर होती हैं। 

5. थोड़ा झुकने से बात बन सकती है तो झुकने में कोई हर्ज नहीं। चाहे आपके विचार भिन्न हों।

6. खर्च का पूरा हिसाब रखें व आपस मे बराबर बाटें। 

7. जाति, धर्म, धार्मिक भावनाओं पर टिप्पणियों से बचें। 

8. सबसे अच्छा तो यह है कि यात्रा उसी के साथ करें जिससे विचार मिलते हों, और जिससे आप पहले से भलीभांति परिचित हों। अगर विचार नहीं मिलते तो साथ घूमने का कोई औचित्य नहीं है।

Sunday, 30 July 2017

कोसी नदी

कोसी नदी



रामनगर के नजदीक जिम कार्बेट नेशनल पार्क जो भी घूमने जाता है तो गर्जिया देवी मन्दिर में दर्शन हेतु जरूर जाता है। साथ ही कोसी को भी जरूर निहारता है। कोसी नदी की विशेषता है कि इसका किसी भी नदी में संगम नहीं होता। इस नदी के पीछे किंवदन्ती है कि ये सात बहनें थीं। भागीरथी, यमुना, सरयू, रामगंगा, काली, गोरी और कोसी। ये सातों बहनें आपस में खूब हंसी ठिठोली करती और साथ-साथ खेलती थी। एक बार सातों बहनों ने निश्चय किया कि हम सभी साथ-साथ निकलेंगी और बीच में सभी एक दूसरे के साथ ही चलेंगी। जब चलने की बारी आई तो कोसी सबसे पहले पहुँच गई। उसने देखा अभी बाकी छह बहने नहीं आई तो अकेले ही आगे निकल पड़ी। जब बाकी छह बहने उस स्थान पर एक साथ पहुंची जहाँ से निकलना था तो देखा कोसी वहां पर नहीं है और आगे निकल चुकी है। छहों बहनों ने गुस्से में कोसी को श्राप दे दिया कि तू हमेशा अकेले ही बहेगी हमको कभी नहीं मिलेगी, तू बहुत आवाज करेगी, तुझमें मनुष्य बहेंगे और तू किसी में नहीं समाएगी।

बरसात के मौसम में यात्रा और सावधानियां

 बरसात और पहाड़


दोस्तों बरसात का मौसम जैसे ही आता है, चारों ओर से खबरें आने लगती हैं कि यहां बाढ़ आयी है, कहीं लैंड स्लाइड हो गया है, कहीं मकान ढह गये हैं तो कहीं सड़कें बन्द पड़ी हैं आदि आदि। कुल मिलाकर अधिकतर खबरें डरावनी ही होती हैं। ऐसे में लगता है कि कहीं घूमने जाने की सोचना ही बेवकूफी है। कुछ हद तक सही भी है, लेकिन पूर्ण रूप से नहीं। 

Friday, 20 January 2017

कंडाली उर्फ़ बिच्छु घास (Nettle)

कंडाली उर्फ़ बिच्छु घास (Nettle)



पहाड़ों में जो भी मित्र गए हैं उनका पाला इस बूटी से जरूर पड़ा होगा। बहुमुखी प्रतिभा की ये बूटी जितना अपने पास आने से डराती है उतनी ही बहुमूल्य बूटी है। इसके बहुमुखी प्रतिभा के होने के कुछ तथ्य इस प्रकार हैं :-

Saturday, 19 November 2016

रिंगाल (मधुमक्खी) का पेथण (छत्ता)

रिंगाल (मधुमक्खी) का पेथण (छत्ता)
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गाँव में हमारे घर में एक दीवार पर सामान रखने के लिए बड़ा सा छेद बनाया जाता है। पहाड़ के घरों की दीवारें काफी चौड़ी होती हैं, जिससे उस छेद में काफी सामान आ जाता है। जिसको गढ़वाली में "आला" कहते हैं। उस आले के अन्दर भी एक छोठा सा छेद था जो दीवार के आर-पार था।

Thursday, 17 November 2016

डाडामंडी का गेंद का मेला (गिंदी कौथिग), Gend Mela in Uttrakhand

डाडामंडी का गेंद का मेला (गिंदी कौथिग):- 

बचपन की एक याद साझा कर रहा हूँ। जब छोठे थे तो प्रत्येक वर्ष जितना होली, दीवाली और किसी भी त्यौहार का इन्तज़ार रहता था उतना ही या उनसे भी ज्यादा इन्तज़ार होता था डाडामंडी (पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड) में होने वाले गेंद के मेले का। 
प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति को होने वाले इस मेले की तब अदभुत छठा होती थी। कई दिन पहले से मेले में जाने की तैयारी शुरू हो जाती थी। माँ हर साल की तरह अपने हाथों से नया स्वेटर बुन कर रखती थी। उस स्वेटर का उदघाटन भी मेले वाले दिन से ही होता था। एक बार की याद है, मैंने माँ को कहा था कि मुझे इस बार मेले में पहनने के लिए जैकेट चाहिए। माँ ने ऊन की जैकेट ही बुन डाली थी। ठीक जैकेट के जैसी। जिसमे दोनों ओर जेब भी थी जिनमे मूंगफली रख कर खाई जा सकती थी। मैं पूरे मेले में दोनों जेबों में मूंगफली रख कर बड़े गर्व से जैकेट पहन के घूम रहा था।

Monday, 14 November 2016

My Trekking Shoes मेरे ट्रैकिंग जूते


ट्रैकिंग जूतों के बारे में मेरी राय :-



ऐसे तो ट्रैकिंग अपने आप में बहुत बड़ा विषय है, साथ ही इसके लिए प्रयुक्त होने वाली सामग्री भी भिन्न-भिन्न प्रकार की हैं। बाजार में कई प्रकार के ब्रांड उपलब्ध हैं, लेकिन मैं स्वयं जो भी सामान ट्रैक के लिए उपयोग करता हूँ, उसके अनुभव साझा करना चाहता हूँ।

Sunday, 16 October 2016

A Visit to Women of India festival 2016

दिल्ली हाट में एक दिन


रविवार का बोरियत भरा दिन होना था। इसलिए पहले ही तय कर लिया था कि इस बार रविवार को दिल्ली हाट (INA) में चल रहे भारतीय महिला उत्सव को देखने जाऊंगा। इसका एक मुख्य कारण यह भी था कि उत्तराखण्ड की किसान बिटिया "रंजना रावत" के स्टाल को देखना था। 

Friday, 7 October 2016

अँधेरे में ट्रैकिंग


अभी हाल में ही कैलाश कुण्ड ट्रैक करके आया हूँ। एक तरह से शानदार यात्रा रही। ऐसे नए अनुभव तो हर यात्रा में होते हैं तो ये यात्रा भी इसका अपवाद नहीं रही।

अभी कुछ दिन पहले मैंने एक राय रखी थी एक व्हाट्स एप्प ग्रुप में। रखी क्या थी जबरदस्ती रखवा दी गई। मेरा मानना है कि पहाड़ों पे अगर आप ग्रुप में यात्रा कर रहे हैं तो दिन में जैसा मर्जी चलें, एक दो किलोमीटर का फासला भी आपस में साथियों के बीच हो तो कोई दिक्कत नहीं। लेकिन अँधेरा छाते ही पूरे ग्रुप को कोशिश करनी चाहिए कि एक साथ चलें। वैसे तो किसी भी ट्रैक की प्लानिंग ऐसी होनी चाहिए कि पहाड़ों में अँधेरे में चलना ही ना पड़े। 

लेकिन ट्रैक पर कई ऐसी बातें हो जाती हैं जो हमारे वश में नहीं होती। अगर ऐसी कोई परिस्तिथि आ जाए तो बजाय आगे-आगे भागने के कोशिश करनी चाहिए कि पूरा ग्रुप एक साथ चले। 

मेरे मित्रों ने इस विषय पर तर्क दिए कि आगे चलकर किसी को कैम्पिंग के लिए जगह ढूंढनी चाहिए। लेकिन मेरा मानना है कि अगर अँधेरे में पीछे छूटे साथी के साथ खुदा ना खास्ता कोई दुर्घटना हो जायेगी तो अँधेरे में किस किस खाई में ढूंढते रहोगे। साथ चलोगे तो जो भी होगा साथ झेलेंगे। 

कई मित्रों ने कई आर्गुमेंट किये...लेकिन दोस्तों बचपन से बड़े बुजुर्गों से हमेशा ही सुनता आया हूँ "गैर वक़्त", जी हाँ जैसे ही अँधेरा छाने लगता है उस वक़्त को गैर वक़्त कहते हैं। यानी ये समय गैरों का है। अक्सर चोट लगने की, गिर कर फिसलने की घटनाएं इसी वक़्त पर होती हैं। 

हो सकता है आज की गूगल जिन्दगी में मेरी बातें तर्कसंगत ना हों। लेकिन पहाड़ों में यही सिखाया जाता है बचपन से, और मैं तो इसी को मानूँगा। मैंने कई दुर्घटनाओं को इसी गैर वक्त में होते देखा है। बाकी सभी समझदार हैं। आपके विवेक पर छोड़ता हूँ..

Sunday, 2 October 2016

देवभूमि में आपका स्वागत है



देवभूमि में आपका स्वागत है

जब भी आप उत्तराखण्ड या हिमाचल में किसी भी क्षेत्र से प्रवेश करते हैं, तो एक बड़ा सा बोर्ड सड़क के बीचों-बीच अक्सर दिखेगा "देवभूमि में आपका स्वागत है"। क्या है देवभूमि ? क्या जगह-जगह खूबसूरत जगहों पर मन्दिरों का होना ही देवभूमि है ? क्या ऊंची-ऊंची चोटियों पर देवस्थान होना ही देवभूमि है ? ये विषय विचारणीय है। 

Saturday, 1 October 2016

आदमखोर बाघ के क्षेत्र में ट्रैकिंग


एक बचपन की याद शेयर कर रहा हूँ आप सभी के साथ... शायद सन 1993-94 की बात है। मैं ग्रेजुएशन कर रहा था, पहाड़ों में हल्की सर्दियाँ शुरू हो चुकी थी। पहाड़ों में  सर्दियाँ शुरू होने का मतलब होता है दिन जल्दी ढलना, मैं और मेरा दोस्त कम चाचा श्रीनगर से कल्जीखाल पहुँचे पिताजी से मिलने, जहाँ पिताजी प्राध्यापक के रूप में कार्यरत थे। 

Friday, 30 September 2016

Cricket Match & Trekking, क्रिकेट मैच और ट्रैकिंग



क्रिकेट का शौकीन बचपन से रहा हूँ। तब भी जब टेलीविज़न नहीं हुआ करता था, रेडियो पर कमेंट्री सुनते थे। एक वाकया याद आ रहा है, मालूम नहीं किस मैच का है, फिर भी बताता हूँ। क्रिकेट मैच हो रहे थे, सर्दियों का समय था। आधी रात से कमेंट्री आती थी। अचानक माँ ने हमको जगाया कि पिताजी घर पर नहीं हैं। 

पिताजी तो गायब हुए ही साथ में जिस रजाई को ओढ़ के सोये थे वो भी गायब। सब घर में परेशान, करीब छह बजे पिताजी रजाई और रेडियो लेकर घर वापिस आ गए। मालूम पड़ा अपने दोस्त जो कि अकेले रहते थे उनके पास रेडियो लेकर कमेंट्री सुनने रजाई समेत पहुँच गए। 

फिर श्याम-श्वेत टेलीविजन का जमाना आया, घर में टेलीविजन नहीं था। मैच देखने तीन किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। वो भी उनके घर पर जहाँ नीचे चटाई में बैठ के मैच देखने को मिलता था। बाकी टेलीविजन मालिक के परिवार वाले शान से चारपाई पर बैठकर मैच देखते थे। हम अछूत के जैसे चप्पल बाहर उतार कर नीचे जमीन में बैठकर ही खुश हो लेते थे। जिस दोस्त के घर में मैच देखने जाते थे उसको बड़ी इज्जत की नजर से देखा जाता था। 

लेकिन दोस्तों आज LED, LCD, 40 इंच, 50 इंच के टेलीविजन पर भी वो मजा नहीं आता जो तब नीचे, हिकारत भरी नजरों से मैच देखने में आता था। 

सात-सात किलोमीटर दूर भी पहाड़ों में ऐसे मैच देखने गया हूँ। 14 किलोमीटर की ट्रैकिंग तो तब ऐसे ही मजाक-मजाक में हो जाती थी।

Thursday, 29 September 2016

प्रस्तावना

दोस्तों, नए ब्लॉग को बनाने की जरुरत महसूस हुई इसलिए बनाना पड़ा। इस ब्लॉग में सिर्फ ट्रैकिंग की महत्वपूर्ण जानकारी प्रकाशित होंगी। यात्रा वृतान्त जैसे प्रकाशित हो रहे हैं, उसी तरह से प्रकाशित होते रहेंगे। इस ब्लॉग को बनाने की जरुरत इसलिए महसूस हुई कि अक्सर कई मित्र पूछते रहते हैं कि वो पहाड़ों पर यात्रा करना चाहते हैं, इसके लिए क्या तैयारी करनी चाहिए, सुरक्षा के लिए क्या करना चाहिए आदि। अपने अनुभव लगातार छोठी-छोठी पोस्ट प्रकाशित करके यहाँ साझा करता रहूँगा, जिससे आपकी जिज्ञासा का कुछ समाधान हो सके। 

जो भी अनुभवी ट्रैकर मित्र हैं अगर वो कोई भी आलेख लिख कर यहाँ प्रकाशित करना चाहें तो हार्दिक ख़ुशी होगी। उनके ब्लॉग का लिंक, फेसबुक अकाउंट का लिंक सब कुछ साथ में लगा मिलेगा। उम्मीद करता हूँ, सभी मित्र इसमें सहयोग करेंगे। सोशियल मीडिया में अगर कोई भी जानकारी से भरपूर पोस्ट मुझे दिखेगी और लगेगा कि इसको आप सबके साथ साझा करना चाहिए तो जिस किसी ने भी उस पोस्ट को लिखा होगा उनसे अनुमति लेकर यहाँ साझा करूँगा। मकसद सिर्फ इतना है कि आप पहाड़ों पर घूमने जाएँ तो पूरी जानकारी के साथ जाएँ और सुरक्षित घुमक्कडी हो।